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नमन नारी को

मिथ्या ही भारतीय सभ्यता- संस्कृति की दुहाई दी जाती है,
अरुण मधुमय देश होने की उपाधि,
बताओ जरा किस बिनाह पर दी जाती है ।
सुबह के उजियारे में यहाँ हर घर - गली में ,
देवी स्वरूपा मिट्टी की प्रतिमा पूजी जाती है ।
रात के अंधियारों में इस देश की,
जाने कितनी गलियों में नारी तन से लूटी जाती है ।
मैं पूछती हूँ क्या अर्थ है मिट्टी की प्रतिमाएं पूजने का ,
जब देवी का ही अंश नारी यहाँ मसलकर,
नित प्रति मिट्टी में मिला दी जाती है ।
कैसी सभ्यता संस्कृति है हमारी,
जहाँ कन्या जन्म से पहले क़त्ल कर दी जाती है ।
रानी लक्ष्मीबाई के इस देश में,
आज भी नारी अबला ही समझी जाती है ।
फूल सी बेटियां एक बोझ मानी जाती हैं ।
'बाल -वधू ', 'ना आन इस देश मेरी लाडो ' जैसे धारावाहिक,
हमारे समाज में नारी की दशा बखूबी दर्शाते हैं।
चाय की चुस्कीयों के साथ हम,
इन धारावाहिकों का लुफ्त तो खूब उठाते हैं ।
मगर हम में से कितने लोग ,
इनके संदेश पर अमल कर पाते हैं ।
नमन है मेरा हर उस नारी को,
जो समाज की गली - सड़ी रूढ़ियों को तोड़,
कुछ कर गुजरने का हौंसला दिखलाती हैं ।
- हिमानी वशिष्ठ

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