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विरह के दिये

विरह के दिये

© हिमानी वशिष्ठ    
                                                        
रात भर चिरागों की जगह, मैं अपना दिल जलाती रही ।
सोचा था वो आकर मुझसे मेरे गम के बारे में पूछेंगे,
और मैं अपना सुलगता हृदय रख दूंगी।
रात भर इसी चाह में मैं धुआँ समेटता रही,
बस इसी चाह में मैं कविता लिखती रही ।
पानी की निर्दोष बूँद की तरह, तपती धरा में विलीन होती रही।
मगर बुझा ना पाई वो अंधेरा, जो मन के अकेले कोने में,
धीरे- धीरे फैलता जा रहा है ।
रात भर मैं मैं आँसुओं को समेटती रही,
और विरह के दिये जलते रहे आँखों में ।
मैं उनके लिए थोड़ी नमी बचाए रखना चाहती थी,
वो आए और बोले,
मेरे लिए भरे अपनी आँखों के इन आँसुओं को पी जाओ ।
अब जलाने को मेरे पास कुछ नहीं बचा,
मैं समिधा में लौट रही हूँ ।।

- हिमानी वशिष्ठ

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